बस यही एक पल है!


आज मैं 1965 में रिलीज़ हुई फिल्म- ‘वक़्त’ का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| फिल्मी गीतों में सभी प्रकार के दर्शन, हर प्रकार के विचारों, फलसफ़ों को अभिव्यक्ति दी जाती है, जैसे जो पार्टी एनिमल कहे जाते हैं, विलन और वेंप होते हैं, उनका अलग फलसफ़ा होता है| ऐसा ही फलसफ़ा इस गीत में व्यक्त किया गया है|

आज का यह गीत साहिर लुधियानवी जी का लिखा हुआ है और इसे रवि जी के संगीत निर्देशन में आशा भोंसले जी और समूह ने गाया था| लीजिए प्रस्तुत हैं इस गीत के बोल –

आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू
जो भी है बस यही एक पल है|

अनजाने सायों का राहों में डेरा है
अनदेखी बाहों ने हम सब को घेरा है,
ये पल उजाला है, बाकी अँधेरा है
ये पल गँवाना ना, ये पल ही तेरा है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|

इस पल के जलवों ने महफ़िल सँवारी है
इस पल की गर्मी ने धड़कन उभारी है,
इस पल के होने से दुनिया हमारी है
ये पल जो देखो तो सदियों पे भारी है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|

इस पल के साये में अपना ठिकाना है
इस पल के आगे की हर शय फ़साना है,
कल किसने देखा है, कल किसने जाना है
इस पल से पाएगा, जो तुझको पाना है,
जीने वाले सोच ले
यही वक़्त है कर ले पूरी आरज़ू|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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