शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही!

आज एक बार फिर से मैं श्रेष्ठ शेयर और ग़ज़ल लेखक राजेश रेड्डी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| राजेश जी की कुछ ग़ज़लें मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज की ग़ज़ल में उन्होंने यह व्यक्त किया है कि वर्तमान समय में लोगों को प्रभावित करने के लिए सच में झूठ की मिलावट बहुत जरूरी है और लोगों को खुद्दारी की काफी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है|

लीजिए आज प्रस्तुत है राजेश रेड्डी जी की यह ग़ज़ल-


अपने सच में झूठ की मिक्दार थोड़ी कम रही ।
कितनी कोशिश की, मगर, हर बार थोड़ी कम रही ।

कुछ अना भी बिकने को तैयार थोड़ी कम रही,
और कुछ दीनार की झनकार थोड़ी कम रही ।

ज़िन्दगी ! तेरे क़दम भी हर बुलन्दी चूमती,
तू ही झुकने के लिए तैयार थोड़ी कम रही ।

सुनते आए हैं कि पानी से भी कट जाते हैं संग,
शायद अपने आँसुओं की धार थोड़ी कम रही ।

या तो इस दुनिया के मनवाने में कोई बात थी,
या हमारी नीयत-ए-इनकार थोड़ी कम रही ।

रंग और ख़ुशबू का जादू अबके पहले सा न था,
मौसम-ए-गुल में बहार इस बार थोड़ी कम रही ।


आज दिल को अक़्ल ने जल्दी ही राज़ी कर लिया
रोज़ से कुछ आज की तकरार थोड़ी कम रही ।

लोग सुन कर दास्ताँ चुप रह गए, रोए नहीं,
शायद अपनी शिद्दत-ए-इज़हार थोड़ी कम रही ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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