बूंद टपकी एक नभ से!

आज एक बार फिर से मैं स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बातचीत के लहजे में सहज भाव से चमत्कारिक बात कह जाते थे| इस कविता में भी, जैसे जब अचानक बारिश होती है, शुरू में एक बूंद से हमें इसकी सूचना मिलती है और फिर तेज बारिश आ जाती है, बारिश के बहाने से कुछ भावों की काव्यमय प्रस्तुति की गई है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता –


बूंद टपकी एक नभ से
किसी ने झुककर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो,
हँस रही-सी आँख ने जैसे
किसी को कस दिया हो|
ठगा-सा कोई किसी की
आँख देखे रह गया हो
उस बहुत से रूप को
रोमांच रो के सह गया हो|

बूंद टपकी एक नभ से
और जैसे पथिक छू
मुस्कान चौंके और घूमे
आँख उसकी जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे
उस तरह मैंने उठाई आँख
बादल फट गया था
चंद्र पर आता हुआ-सा
अभ्र थोड़ा हट गया था|

बूंद टपकी एक नभ से
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बन्द हो ले
और नूपुर ध्वनि झमककर
जिस तरह द्रुत छन्द हो ले
उस तरह
बादल सिमटकर,
चंद्र पर छाए अचानक
और पानी के हज़ारों बूंद
तब आए अचानक|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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