देखेगा कौन?

हिन्दी नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी, हिन्दी गीत साहित्य में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे|

आज मैं स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूं-


बगिया में नाचेगा मोर,
देखेगा कौन?
तुम बिन ओ मेरे चितचोर,
देखेगा कौन?

नदिया का यह नीला जल, रेतीला घाट,
झाऊ की झुरमुट के बीच, यह सूनी बाट,
रह-रह कर उठती हिलकोर,
देखेगा कौन?

आँखड़ियों से झरते लोर,
देखेगा कौन?

बौने ढाकों का यह वन, लपटों के फूल,
पगडंडी के उठते पाँव, रोकते बबूल,
बौराये आमों की ओर,
देखेगा कौन?
पाथर-सा ले हिया कठोर,
देखेगा कौन?

नाचती हुई फुल-सुंघनी, बनतीतर शोख,
घास पर सोन-चिरैया, डाल पर महोख,
मैना की यह पतली ठोर,
देखेगा कौन?
कलंगी वाले ये कठफोर,
देखेगा कौन?

आसमान की ऐंठन-सी धुएँ की लकीर,
ओर-छोर नापती हुई, जलती शहतीर,
छू-छूकर सांझ और भोर,
देखेगा कौन?
दुखती यह देह पोर-पोर,
देखेगा कौन?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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