प्रेम

छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| कविता के हर काल का अपना मुहावरा होता है, अभिव्यक्ति का अपना अलग अन्दाज़ होता है| आज की कविता में पंत जी ने अपने तरीके से प्रेम को अभिव्यक्ति दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की यह कविता –

मैंने
गुलाब की
मौन शोभा को देखा !

उससे विनती की
तुम अपनी
अनिमेष सुषमा को
शुभ्र गहराइयों का रहस्य
मेरे मन की आँखों में
खोलो !

मैं अवाक् रह गया !
वह सजीव प्रेम था !

मैंने सूँघा,
वह उन्मुक्त प्रेम था !
मेरा हृदय
असीम माधुर्य से भर गया !

मैंने
गुलाब को
ओंठों से लगाया !
उसका सौकुमार्य
शुभ्र अशरीरी प्रेम था !

मैं गुलाब की
अक्षय शोभा को
निहारता रह गया !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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