कविता कैसे लिखते हो तुम!

राजनैतिक विचार देने में अक्सर संकट शामिल होता है, लेकिन मुझे लगता है कि यह काम भी कभी-कभी करना चाहिए, भले ही वह धारा के विरुद्ध जाता हो|


एक फैशन सा बन गया है कि जिन कवियों की वाणी से आपातकाल के विरुद्ध एक शब्द नहीं निकल पाया, आज वे जी भरकर सरकार को गालियां भी देते हैं और यह भी कहते हैं कि बहुत दमन हो रहा है, नागरिक स्वतंत्रता पर बहुत बड़ा संकट मंडरा रहा है|

हमने एक वर्ष से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर किया गया तमाशा देखा, जिसे विदेशों से स्पांसर किया गया था| आज उसकी खुराक प्रायोजक देश कनाडा को भी भुगतनी पड़ रही है| मजबूरी में प्रधान मंत्री जी को देशहित में वे कृषि कानून वापस लेने पड़े, जो कृषि विशेषज्ञों की राय के अनुसार किसानों, विशेष रूप से छोटे किसानों के हित में थे|

ऐसे में कवियों की भूमिका क्या हो सकती है, ये बिरादरी तो मार्क्सवादी दिव्य दृष्टि से युक्त है और ऐसा नहीं लगता कि ये वास्तव में देशहित को समझ भी सकते हैं| विभिन्न कदमों के आधार पर सरकार की आलोचना करनी ही चाहिए परंतु ये मार्क्सवादी बिरादरी तो यह मान बैठी है कि जनता ने मूर्खतावश गलत निर्णय लेकर यह सरकार बना दी है, जो कोई बड़ा घोटाला नहीं कर रही, पत्रकारों और कवियों को विश्व भ्रमण नहीं करा रही आदि-आदि|

हर दल के साथ कुछ अच्छाइयाँ और बुराइयाँ होती हैं, उनके समर्थक भी एक या दूसरी प्रकार से अतिवादी होते हैं और हैं|

ये बातें मैं कह सकता हूँ क्योंकि मुझे तो कोई चुनाव नहीं लड़ना है, ऐसे में मार्क्सवादी दिमाग़ों से उपजी कविताओं पर प्रतिक्रिया के रूप में कुछ लिखा है, आप चाहें तो इसे कविता मान सकते हैं|


इतनी घृणा संजोकर मन में,
कविता कैसे लिखते हो तुम|

सत्ता का विरोध आखिर जब,
बन जाए विरोध दल का ही,
और सम्मिलित हो कवि इसमें
किसी पक्ष का बन ध्वजवाही|
तब जो हो, वह नारा होगा,
उसको कविता कहते हो तुम|

राजनीति में तो होंगे ही,
घोर समर्थक, घोर विरोधी,
पर कवि की भूमिका नहीं है,
किसी पक्ष में डट जाने की,
घृणा बुराई से ही करिए,
लोगों से क्यों करते हो तुम|

जनता चुनती है शासक को,
कमियाँ सदा बता सकते तुम,
पर जनमत को ही नकारकर
अलग कहानी कहते हो तुम|
कहां हुई गलतियां बताओ
क्यों फतवे ही देते हो तुम|


-श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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