तन है केवल, प्राण कहाँ हैं !

हमारी हिन्दी फिल्मों के लिए असंख्य लोकप्रिय गीत लिखने वाले, जनकवि शैलेन्द्र जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| शैलेन्द्र जी ने जो कुछ भी लिखा उसमें उनकी अलग छाप दिखाई देती है| आज की इस कविता में भी कुछ ऐसे गहन भाव हैं जो अभिव्यक्त करते हैं कि जीवन में अभाव कैसे-कैसे हो सकते हैं

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शैलेन्द्र जी की यह कविता-


पूछ रहे हो क्या अभाव है
तन है केवल, प्राण कहाँ हैं ?

डूबा-डूबा सा अन्तर है
यह बिखरी-सी भाव लहर है,
अस्फुट मेरे स्वर हैं लेकिन
मेरे जीवन के गान कहाँ हैं ?

मेरी अभिलाषाएँ अनगिन
पूरी होंगी ? यही है कठिन,
जो ख़ुद ही पूरी हो जाएँ —
ऐसे ये अरमान कहाँ हैं ?

लाख परायों से परिचित है,
मेल-मोहब्बत का अभिनय है,
जिनके बिन जग सूना-सूना
मन के वे मेहमान कहाँ हैं ?


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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