तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं!

आज मैं फिर से अपने अत्यंत प्रिय कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, जो मुझे अत्यंत प्रिय रहा है| शायद इस गीत का कुछ भाग मैंने पहले भी शेयर किया हो| यह गीत व्यक्ति के आशावाद और जीवट शक्ति को प्रबल अभिव्यक्ति देता है| परेशानियों से हार न मानने और संघर्ष करते जाने की ऊर्जा और उत्साह का गीत|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत-

फैली है दूर तक परेशानी
तिनके-सा तिरता हूँ, तो क्या है ?
तुमसे नाराज़ तो नहीं हूँ मैं|

आँसू का शिलालेख है जीवन
बिना पढ़ा, बिना छुआ
अन्धी बरसात बद्‍दुआओं की
नफ़रत का घना धुँआ,

मकड़ी के जाले-सी पेशानी
साथ लिए फिरता हूँ, तो क्या है ?
टूटी आवाज़ तो नहीं हूँ मैं|

मैं दूँगा भाग्य की लकीरों को
रोशनी सवेरे की
देखूँगा कितने दिन चलती है
दुश्मनी अँधेरे की,

जीऊँ क्यों माँग कर मेहरबानी
संकट में घिरता हूँ, तो क्या है ?
कोई सरताज तो नहीं हूँ मैं|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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