या लब-ए-साग़र से पियो!

चश्म-ए-साक़ी से पियो या लब-ए-साग़र से पियो,
बे-ख़ुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं|

ख़ामोश ग़ाज़ीपुरी

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