मेरे मन-मिरगा नहीं मचल

आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कुल मिलाकर गीत अक्सर भावुकता का ही व्यापार होते हैं, जैसे नीरज जी ने लिखा – ‘हूँ बहुत नादान करता हूँ ये नादानी, बेचकर खुशियां खरीदूँ आँख का पानी’ या भारत भूषण जी ने ही लिखा- ‘तू मन अनमना न कर अपना, इसमें कुछ दोष नहीं तेरा, धरती के कागज़ पर मेरी तस्वीर अधूरी राहनी थी’| भारत भूषण जी का काव्य पाठ सुनना वास्तव में एक दिव्य अनुभव होता था|

लीजिए आज प्रस्तुत है भारत भूषण जी का यह गीत, जिसमें मन को बहलाने का प्रयास किया गया है-

मेरे मन-मिरगा नहीं मचल
हर दिशि केवल मृगजल-मृगजल!

प्रतिमाओं का इतिहास यही
उनको कोई भी प्यास नहीं
तू जीवन भर मंदिर-मंदिर
बिखराता फिर अपना दृगजल!

खौलते हुए उन्मादों को
अनुप्रास बने अपराधों को
निश्चित है बाँध न पाएगा
झीने-से रेशम का आँचल!

भीगी पलकें भीगा तकिया
भावुकता ने उपहार दिया
सिर माथे चढा इसे भी तू
ये तेरी पूजा का प्रतिफल!

आज के लिए इतना ही, नमस्कार|

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