चांदनी फैली गगन में, चाह मन में!

आज एक बार फिर से मैं हिन्दी गीत परंपरा के एक अत्यंत सम्मानित सदस्य, श्री अमिताभ बच्चन जी के पूज्य पिताश्री और हिन्दी कवि सम्मेलनों में श्रोताओं को अपने गीतों से भाव विभोर करने वाले स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत प्रस्तुत है| बाहर की दुनिया में कैसी हलचल चलती हैं ये तो सब बता सकते हैं, समाचारों में भी ये सब आ सकता है, लेकिन मन के भीतर क्या चलता है, इसकी सही अभिव्यक्ति कोई संवेदनशील रचनाकार ही कर सकता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत –


चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।

दिवस में सबके लिए बस एक जग है
रात में हर एक की दुनिया अलग है,
कल्‍पना करने लगी अब राह मन में;
चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।

भूमि के उर तप्‍त करता चंद्र शीतल
व्‍योम की छाती जुड़ाती रश्मि कोमल,
किंतु भरतीं भवनाएँ दाह मन में;
चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।

कुछ अंधेरा, कुछ उजाला, क्‍या समा है!
कुछ करो, इस चांदनी में सब क्षमा है;
किंतु बैठा मैं संजोए आह मन में;
चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।


चांद निखरा, चंद्रिका निखरी हुई है,
भूमि से आकाश तक बिखरी हुई है,
काश मैं भी यों बिखर सकता भुवन में;
चांदनी फैली गगन में, चाह मन में।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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