क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है !

मेरे अत्यंत प्रिय रहे सृजनधर्मी नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक और गीत आज शेयर कर रहा हूँ| रमेश रंजक जी ने वास्तव में नवगीत विधा में नई ऊँचाइयाँ हासिल की थीं और उनसे हमेशा चमत्कारिक अभिव्यक्ति की उम्मीद बनी रहती थी| काव्यधर्म का वे हमेशा कड़ाई से पालन करते थे और उन्होंने अनेक कालजयी गीत हमें दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत जो कवि की खुद्दारी और ईमानदारी को अभिव्यक्ति देता है –

क़लम में आग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।

कहाँ हैं शब्द के अंगार उनमें
क़लम जिनकी ख़रीदी जा चुकी है
लिखेंगे क्या ? गुनाहों की कहानी
जिन्हें मोटी रक़म हथिया चुकी है|

तपस्या त्याग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।

क़लम बिकती नहीं है सिर्फ़ उसकी
जुड़ा है जो ज़मीं से, आदमी से
उसी ने चेतना को नोक दी है
दुखी है जो समय की त्रासदी से|

रगों में राग है तो ज़िन्दगी है ।
क़लम बेदाग है तो ज़िन्दगी है ।।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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