दिल चुरा कर न हमको !

स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की एक रूमानी कविता आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी अपने समय के सुरीले कवियों, गीतकारों में गिने जाते थे और कवि सम्मेलनों में उनका काव्य पाठ सुनने के लिए भी श्रोता लालायित रहते थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह ‘नेपाली’ जी की यह कविता–

दिल चुरा कर न हमको बुलाया करो,
गुनगुना कर न गम को सुलाया करो|

दो दिलों के मिलन का यहाँ है चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
रंग भी गुल शमा के बदलने लगे
तुम हमीं को न कस्में खिलाया करो,

सर झुकाया गगन ने धरा मिल गई
तुम न पलकें सुबह तक झुकाया करो,
सिंधु के पार को चांद जागा करे
तुम न पायल अकेली बजाया करो|

मन्दिरों में तरसते उमर बिक गई
सर झुकाते झुकाते कमर झुक गई,
घूम तारे रहे रात की नाव में
आज है रतजगा प्यार के गाँव में|

दो दिलों का मिलन है यहाँ का चलन
खुद न आया करो तो बुलाया करो,
नाचता प्यार है हुस्न की छाँव में
हाथ देकर न उंगली छुड़ाया करो|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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