ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे!

इतना मालूम है, ख़ामोश है सारी महफ़िल,
पर न मालूम, ये ख़ामोशी कहाँ तक पहुंचे ।

गोपालदास “नीरज”

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