आ गए किस द्वीप में हम!

एक बार फिर से मैं आज माननीय सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने जहां राष्ट्रप्रेम, राजभाषा प्रेम और रूमानी प्रेम के एक से एक बढ़कर गीत लिखे हैं वहीं मानवीय सरोकारों को भी बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है|

लीजिए आज प्रस्तुत है माननीय सोम ठाकुर जी का, आज के समय को अपने अलग अंदाज़ में वर्णित करता यह गीत –

आ गये किस द्वीप में हम
देह पत्थर हो गई
सर्पगंधा एक डाकिन
साथ में फिरने लगी|

नाम लिख आए जहाँ हम
गुनगुनाती खुशबुओं से
ढह गये वे बुर्ज
कुछ टूटे कंगूरे रह गए
बढ़ चले हैं पाँव
पीछे को बुलाती सीढ़ियों पर
हो गये पूरे कथानक
हम अधूरे रह गए
|

प्रश्न-वृक्षों की उठी शाखें हुईं नंगी
कि गुमसूँ पर्वतों पर
बर्फ की ताज़ा रुई गिरने लगी
पड़ गए जल में रवे
लहरें थमी हैं
घूमकर लौटीं नहीं
वे चुंबनो कीली हुई ज़िंदा हवाएँ
शिला खिसका कर मुहाने से
बुलाने लग गई हैं
वक्ष तक जल से भरी
अंधी गुफाएँ
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जिस सतह पर डूबकर
उछली नही हंसापरी वह
सोनरंगी मरी मछली
काँपकर तिरने लगी|

अब नहीं
वे चुंबको- गुज़री हुई सह यात्राएँ
सूर्य -मंत्रों को मिला
कोलाहलों का साथ
कमल पत्ते पर रखी मणि को
उठाने लग गये हैं
जंगली एहसास के दो हाथ
|

मारती है रक्त के छींटे
लिए टूटे हुए परमाणु – क्रम जो
वह घटा
हेमंत के आकाश में
घिरने लगी
सर्पगंधा एक डाकिन
साथ में फिरने लगी
|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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