मुझको क्या-क्या नहीं मिला!

हिन्दी नवगीत के प्रणेता स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत आज शेयर कर रहा हूँ| इस नवगीत में उन्होंने जीवन की स्वाभाविक संपन्नताओं के साथ ही विपन्नताओं का उल्लेख किया है और आज के जीवन की जटिलताओं, संकटों की ओर भी बड़ा प्रभावी संकेत किया गया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत ‘मुझको क्या-क्या नहीं मिला’–

राजा से हाथी घोड़े
रानी से सोने के बाल,
मुझको क्या-क्या नहीं मिला
मन ने सब-कुछ रखा संभाल।

चंदा से हिरनों का रथ
सूरज से रेशमी लगाम,
पूरब से उड़नखटोले
पश्चिम से परियाँ गुमनाम।
रातों से चाँदी की नाव
दिन से मछुए वाला जाल!

बादल से झरती रुन-झुन
बिजली से उड़ते कंगन,
पुरवा से सन्दली महक
पछुवा से देह की छुवन।
सुबहों से जुड़े हुए हाथ
शामों से हिलते रूमाल!

नभ से अनदेखी ज़ंजीर
धरती से कसते बन्धन,
यौवन से गर्म सलाखें
जीवन से अनमांगा रण।
पुरखों से टूटी तलवार
बरसों से ज़ंग लगी ढाल!

गलियों से मुर्दों की गंध
सड़कों से प्रेत का कुआँ,
घर से दानव का पिंजड़ा
द्वार से मसान का धुआँ!
खिड़की से गूँगे उत्तर
देहरी से चीख़ते सवाल!

मुझको क्या-क्या नहीं मिला
मन में सब-कुछ रखा संभाल!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

4 Comments

Leave a Reply