गीत फूल-फूले!

स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत आज प्रस्तुत कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई थी और कुछ अद्भुद नवगीत उन्होंने हमें दिए हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जो गीतों की मोहकता और प्रभाव विस्तार को लेकर ही है –

सुधियों की अरगनी बाँध कर सम्बोधन झूले
सहन भर गीत फूल-फूले|

सर्वनाम आकर सिरहाने
माथा दबा गया
अनबुहरा घर लगा दीखने
फिर से नया-नया
तन-मन हल्का हुआ, अश्रु का भारीपन भूले|


मिली, खिली रोशनी, अँधेरा
पीछे छूट गया,
ऐसा लगा कि दीवाली का
दर्पण टूट गया,
लगे दीखने तारे जैसे हों लँगड़े-लूले|

हवा किसी रसवन्ती ऋतु की
साँकल खोल गई,
होठों की पँखुरी न खोली
फिर भी बोल गई,
सम्भव है यह गन्ध तुम्हारे आँचल को छू ले|


दमक उठे दालान, देहरी
महकी क्यारी-सी,
लगी चहकने अनबोली
बाखर फुलवारी-सी,
झूम उठे सारे वातायन भीनी ख़ुशबू ले|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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