कठपुतली!

स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी अपनी तरह के अनूठे रचनाकार थे जो बड़ी सरलता से, बातचीत के लहज़े में बहुत गहरी बात कह जाते थे| भवानी दादा को अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हुए थे लेकिन यह भी सत्य है कि फिल्मों की मायानगरी में वे एडजस्ट नहीं हो पाए थे और वहां उन्होंने यह रचना लिखी थी- ‘जी हां हुज़ूर मैं गीत बेचता हूँ’ जो कि पैसे के लिए, मायानगरी में रचनाकर्म करने वाले कवियों के दर्द की बहुत गहन अभिव्यक्ति है|

लीजिए आज प्रस्तुत है कठपुतलियों के बहाने से लिखी गई भवानी दादा की एक सारगर्भित कविता –

कठपुतली
गुस्से से उबली
बोली – ये धागे
क्यों हैं मेरे पीछे आगे ?

तब तक दूसरी कठपुतलियां
बोलीं कि हां हां हां
क्यों हैं ये धागे
हमारे पीछे-आगे ?
हमें अपने पांवों पर छोड़ दो,
इन सारे धागों को तोड़ दो !


बेचारा बाज़ीगर
हक्का-बक्का रह गया सुन कर
फिर सोचा अगर डर गया
तो ये भी मर गयीं मैं भी मर गया
और उसने बिना कुछ परवाह किए
जोर जोर धागे खींचे
उन्हें नचाया !

कठपुतलियों की भी समझ में आया
कि हम तो कोरे काठ की हैं
जब तक धागे हैं,बाजीगर है
तब तक ठाठ की हैं
और हमें ठाठ में रहना है
याने कोरे काठ की रहना है|


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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