उजाले की खुशबू

एक बार फिर से मैं कवि सम्मेलनों में अपने गीतों के माध्यम से श्रोताओं के मन में अपनी अमिट छाप बनाने वाले सृजनधर्मी गीतकार श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने अपने गीतों में अभिव्यक्ति की बहुत मंज़िलें पार की हैं, सरल भाषा में अक्सर बहुत गहरी बात वे अपने गीतों में करते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह श्रेष्ठ गीत जिसमें उन्होंने बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति की है–

झरे हुए वर्षो को
उगने वाले कल को
हमने दी खुले उजाले की खुशबू
हर कोलाहल को|

सुना किए सहमे खामोश प्रहर
गाथाएँ ठोस अंधेरे की
यह कैसी हवा चली! और बढ़ी
सीमाएं खूनी घेरे की
गहराती गई मृत्युगंधा हर झील यहाँ
प्रश्न उठा -कौन सूर्य सोखेगा
ज़हर -घुले जल को?

अंतहीन कड़ुआया बहरापन
भीड़ों को चीरता गया
एक ध्वंस -धर्मा अँधा मौसम
अंकुर के पास आ गया
होंठों पर हरे शब्द रखकर हम
जिया किए केवल भीतर के मरुथल को

पलक उठाते दिन का नया उदय है
तट पर बेहोश हुई शाम यह नहीं
है यह आरंभ नई मंज़िल का
काँपता विराम यह नही
अब स्वयं ग़ुजरकर हम सुलगते वनों से
पार करेंगे पाँवों -लिपटे दलदल को|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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