इन दिनों है दुख शिखर पर!

आज मैं हिन्दी नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| जीवन में कितना कुछ होता है अभिव्यक्त करने के लिए जिसको कविगण, विशेष रूप से गीतकार बहुत सरल और प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर देते हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह श्रेष्ठ गीत जिसमें उन्होंने जीवन स्थितियों की बहुत सुंदर अभिव्यक्ति की है–

रह गया सब कुछ बिखर कर
इन दिनों है दुख शिखर पर

एक पल में हो गया सब कुछ अधूरा
कुछ हुआ ऐसा कि टूटा तानपूरा
शब्द का संगीत चुप है काँपता हर गीत थर-थर

और ऊपर उठ रही है तेज़ धारा
यह किसी रूठी नदी का है इशारा
द्वीप जैसा हो गया है बाढ़ में घिरता हुआ घर

देखने में नहीं लगता साधुओं सा
दुख शलाका पुरुष-सा है आँसुओं का
रहा आँखों में बहुत दिन आज है लंबे सफ़र पर।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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