मिट्टी बोलती है!

फिर से एक बार मैं अपने एक अत्यंत प्रिय नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी ने नवगीत के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी| बहुत से अमर नवगीतों की रचना उन्होंने की है, जिनमें आम आदमी के संघर्ष को वाणी दी गई है|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत, जिसमें ऐसे किसान की त्रासदी का जिक्र किया गया है, जिसका सिंचाई का साधन, उसका रहट, चकबंदी के अंतर्गत बनने वाली सड़क में या जाए, फिर उसको कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है| दरअसल जमीन से दूर रहकर जो योजनाएं बनती हैं वे आम आदमी के प्रति उतनी संवेदनशील नहीं होतीं| लीजिए प्रस्तुत है यह नवगीत –

रहट जब चकरोड में आ जाए
और सूखी रोटियाँ खा जाए
मिट्टी बोलती है|

बोलती है छन्द जो सन्दर्भ में अपने
टूट जाते हैं बया के घोंसले-से
झूलते नीले-हरे सपने,

हर पुराने शब्द में
ध्वन्यर्थ गहरा घोलती है
मिट्टी बोलती है|

अर्थ ये इतिहास को
भूगोल से यूँ जोड़ देते हैं
रीति में डूबी हुई
पगडंडियों को मोड़ देते हैं


झुर्रियों के बीच में धँस कर
आदमी में आदमी को तोलती है|
मिट्टी बोलती है|



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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