जीवन में अरमानों का !

आज एक बार मैं अपने जमाने में काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग कविता से पहचान बनाने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| रंग जी अक्सर कविता को आत्म कथन के रूप में, कहें कि अपनी गवाही, अपने स्वाभिमान की अभिव्यक्ति के रूप में भी प्रस्तुत करते थे|

आज के इस गीत में भी रंग जी ने जीवन के बारे में कुछ बहुत सुंदर अभिव्यक्तियाँ की हैं| लीजिए प्रस्तुत है यह गीत-

जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है

मैंने ऐसा मनुज न देखा
अंतर में अरमान न जिसके,
मिला देवता मुझे न कोई
शाप बने वरदान न जिसके ।
पंथी को क्या ज्ञात कि
पथ की जड़ता में चेतनता है ?
पंथी के श्रम स्वेद-कणों से पथ गतिमान नहीं होता है ।
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।


यदि मेरे अरमान किसी के
उर पाहन तक पहुँच न पाए,
अचरज की कुछ बात नहीं
जो जग ने मेरे गीत न गाए ।
यह कह कर संतोष कर लिया-
करता हूँ मैं अपने उर में,
अरुण-शिखा के बिना कहीं क्या स्वर्ण-विहान नहीं होता है
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।

मैं ही नहीं अकेला आकुल
मेरी भाँति दुखी जन अनगिन,
एक बार सब के जीवन में
आते गायन रोदन के क्षण,
फिर भी सब के मन का सुख-दुख एक समान नहीं होता है ।
जीवन में अरमानों का आदान-प्रदान नहीं होता है ।

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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