मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ!

हिन्दी काव्य मंचों पर अपने समय के एक लोकप्रिय कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था-

बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा,
मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा|


इसके अलावा फिल्मों के लिए लिखे गए उनके गीतों में से यह भजननुमा गीत किसी समय बहुत लोकप्रिय हुआ था- ‘दर्शन दो घनश्याम नाथ मेरी अँखियाँ प्यासी रे’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की यह भावपूर्ण कविता –

मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ
नील गगन में पंख पसारूँ;
दुःख है, तुमसे बिछड़ गया हूँ
किन्तु तुम्हारी सुधि न बिसारूँ!

उलझन में दुःख में वियोग में
अब तुम याद बहुत आती हो;
घनी घटा में तुमको खोजूँ
मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ;

जब से बिछुड़े हैं हम दोनों
मति-गति मेरी बदल गई है;
पावस में हिम में बसंत में
हँसते-रोते तुम्हें पुकारूँ!

तब तक मन मंदिर में मेरे
होती रहे तुम्हारी पग-ध्वनि;
तब तक उत्साहित हूँ, बाजी
इस जीवन की कभी न हारूँ!

तुम हो दूर दूर हूँ मैं भी
जीने की यह रीती निकालें,
तुम प्रेमी हो-प्रेम पसारो
मैं प्रेमी हूँ-जीवन वारूँ!!


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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