हाथ मेरा खुरदरा हुआ!

गिन गिन के सिक्के हाथ मेरा खुरदरा हुआ,
जाती रही वो लम्स* की नर्मी, बुरा हुआ|
(लम्स – स्पर्श)

जावेद अख़्तर

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