हार न अपनी मानूँगा मैं !


आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर गीतों के राजकुंवर के नाम से जिनको जाना जाता था, ऐसे स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| नीरज जी जहां कवि सम्मेलनों में श्रोताओं का मन मोह लेते थे, वहीं हमारी हिन्दी फिल्मों में भी उन्होंने बहुत यादगार गीत दिए हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय गोपाल दास नीरज जी की यह रचना–

हार न अपनी मानूँगा मैं !

चाहे पथ में शूल बिछाओ
चाहे ज्वालामुखी बसाओ,
किन्तु मुझे जब जाना ही है —
तलवारों की धारों पर भी, हँस कर पैर बढ़ा लूँगा मैं !

मन में मरू-सी प्यास जगाओ,
रस की बूँद नहीं बरसाओ,
किन्तु मुझे जब जीना ही है —
मसल-मसल कर उर के छाले, अपनी प्यास बुझा लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !


चाहे चिर गायन सो जाए,
और ह्रदय मुरदा हो जाए,
किन्तु मुझे अब जीना ही है —
बैठ चिता की छाती पर भी, मादक गीत सुना लूँगा मैं !

हार न अपनी मानूंगा मैं !


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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