जमुन – जल मेघ!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ कवि, गीतकार, संपादक और राजभाषा से जुड़े उच्च अधिकारी रहे, माननीय डॉक्टर बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| डॉक्टर मिश्र की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं, आज का यह नवगीत उनके नवगीत संग्रह- ‘शिखरिणी’ से लिया गया है|
मौसम के छविचित्र को अपने अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करने वाला यह नवगीत आज प्रस्तुत है –

लौट आए हैं जमुन-जल मेघ
सिन्धु की अंतर्कथा लेकर ।
यों फले हैं टूटकर जामुन
झुक गई आकाश की डाली
झाँकती हैं ओट से रह-रह
बिजलियाँ तिरछी नज़र वाली
ये उठे कंधे, झुके कुंतल
क्या करें काली घटा लेकर !

रतजगा लौटा कजरियों का
फिर बसी दुनिया मचानों की
चहचहाए हैं हरे पाखी
दीन आँखों में किसानों की
खंडहरों में यक्ष के साए
ढूंढ़ते किसको दिया लेकर ?

दूर तक फैली जुही की गंध
दिप उठी सतरंगिनी मन की
चंद भँवरे ही उदासे गीत
गा रहे झुलसे कमल-वन में
कौन आया द्वार तक मेरे
दर्भजल सींची ऋचा लेकर ?
(दर्भजल=कुश से टपकता जल)


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

Leave a Reply