प्यार की बोली, बोले कौन!

आज एक बार फिर से मैं, अपनी कविताओं, नज़्मों, कहानियों और उपन्यासों में बड़ी सादगी से बड़ी बातें कहने वाले ज़नाब राही मासूम रज़ा साहब की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| उनका एक प्रसिद्ध उपन्यास है ‘दिल एक सादा कागज़’ मुझे याद है उनके उपन्यास पढ़ते हुए भी ऐसा लगता था जैसे कोई कविता पढ़ रहे हों| उनकी इस तरह की एक बहुत सुंदर रचना मैं पहले भी शेयर कर चुका हूँ, ‘लेकिन मेरा लावारिस दिल’ |

लीजिए आज राही मासूम रज़ा साहब की यह रचना शेयर कर रहा हूँ, इस रचना में बहुत सादगी से जो बातें उन्होंने कही हैं वे आज के असहिष्णुता भरे माहौल में बहुत महत्वपूर्ण हैं –

सब डरते हैं, आज हवस के इस सहरा में बोले कौन,
इश्क तराजू तो है, लेकिन, इस पे दिलों को तौले कौन
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सारा नगर तो ख्वाबों की मैयत लेकर श्मशान गया,
दिल की दुकानें बंद पड़ी है, पर ये दुकानें खोले कौन
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काली रात के मुँह से टपके जाने वाली सुबह का जूनून,
सच तो यही है, लेकिन यारों, यह कड़वा सच बोले कौन
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हमने दिल का सागर मथ कर काढ़ा तो कुछ अमृत,
लेकिन आयी, जहर के प्यालों में यह अमृत घोले कौन
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लोग अपनों के खूँ में नहा कर गीता और कुरान पढ़ें,
प्यार की बोली याद है किसको, प्यार की बोली बोले कौन


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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