वसंत आ गया!

स्वर्गीय दुष्यंत कुमार जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| दुष्यंत जी द्वारा आपातकाल के दौरान लिखी गई ग़ज़लें तो व्यापक जन-समुदाय तक पहुंची हैं, जिनको ‘साये में धूप’ नाम से संकलित किया गया था||

लीजिए आज दुष्यंत कुमार जी की यह रचना ‘वसंत आ गया’ शेयर कर रहा हूँ, इस रचना में बहुत सुंदर तरीके से यह अभिव्यक्त किया गया है कि जिम्मेदारियों के बोझ से दबे व्यक्ति को किस प्रकार वसंत के आने और जाने का भी एहसास नहीं हो पाता| लीजिए प्रस्तुत है यह कविता –


वसंत आ गया
और मुझे पता नहीं चला
नया-नया पिता का बुढ़ापा था
बच्चों की भूख
और
माँ की खांसी से छत हिलती थी,
यौवन हर क्षण
सूखे पत्तों-सा झड़ता था
हिम्मत कहाँ तक साथ देती
रोज मैं सपनों के खरल में
गिलोय और त्रिफला रगड़ता था जाने कब
आँगन में खड़ा हुआ एक वृक्ष
फूला और फला
मुझे पता नहीं चला…

मेरी टेबल पर फाइलें बहुत थीं
मेरे दफ्तर में
विगत और आगत के बीच
एक युद्ध चल रहा था
शांति के प्रयत्न विफल होने के बाद
मैं
शब्दों की कालकोठरी में पड़ा था
मेरी संज्ञा में सड़क रुंध गई थी
मेरी आँखों में नगर जल रहा था
मैंने बार-बार
घड़ी को निहारा
और आँखों को मला
मुझे पता नहीं चला।

मैंने बाज़ार से रसोई तक
जरा सी चढ़ाई पार करने में
आयु को खपा दिया
रोज बीस कदम रखे-
एक पग बढ़ा।
मेरे आसपास शाम ढल आई।
मेरी साँस फूलने लगी
मुझे उस भविष्य तक पहुँचने से पहले ही रुकना पड़ा
लगा मुझे
केवल आदर्शों ने मारा
सिर्फ सत्यों ने छला
मुझे पता नहीं चला|

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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