बदल दिये कैलेण्डर!

आज एक बार फिर से मैं अपने अत्यंत प्रिय गीतकार स्वर्गीय भारत भूषण जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मैंने पहले भी उनके बहुत से गीत अपने ब्लॉग में शेयर की हैं| हमारी पीढ़ी इस बात पर गर्व कर सकती है कि हमें भारत भूषण जी जैसे महान गीतकार को साक्षात देखने और सुनने का अवसर मिल पाया|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण जी का यह गीत-

फिर फिर
बदल दिये कैलेण्डर
तिथियों के संग संग प्राणों में
लगा रेंगने
अजगर सा डर
सिमट रही साँसों की गिनती
सुइयों का क्रम जीत रहा है!

पढ़कर
कामायनी बहुत दिन
मन वैराग्य शतक तक आया
उतने पंख थके जितनी भी
दूर दूर नभ
में उड़ आया
अब ये जाने राम कि कैसा
अच्छा बुरा अतीत रहा है!

संस्मरण
हो गई जिन्दगी
कथा कहानी सी घटनाएँ
कुछ मनबीती कहनी हो तो
अब किसको
आवाज लगाएँ
कहने सुनने सहने दहने
को केवल बस गीत रहा है!

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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