ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है!

जो मुझको ज़िंदा जला रहे हैं वो बेख़बर हैं,
कि मेरी ज़ंजीर धीरे-धीरे पिघल रही है|

जावेद अख़्तर

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