भीड़ में खो गये!

ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब का एक गीत आज शेयर कर रहा हूँ| फ़ाकिर साहब ने बहुत सी प्यारी ग़ज़लें और शेर लिखे हैं जिनको जगजीत सिंह जी और अनेक अन्य प्रसिद्ध गायकों ने गाया है|

आज के इस गीत में भी गाँव से जुड़ी यादों को बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया गया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है ज़नाब सुदर्शन फ़ाकिर साहब का यह गीत –

एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव…
छाँव में आशियाँ था, एक छोटा मकां था
छोड़ कर गाँव को, उस घनी छाँव को
शहर के हो गये , भीड़ में खो गये

वो नदी का किनारा, जिसपे बचपन गुज़ारा
वो लड़कपन दीवाना, रोज़ पनघट पे जाना
फिर जब आयी जवानी, बन गये हम कहानी
छोड़ कर गाँव को, उस उस घनी छाँव को
शहर के हो गये , भीड़ में खो गये
एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव…


कितने गहरे थे रिश्ते, लोग थे या फ़रिश्ते
एक टुकड़ा ज़मी थी, अपनी जन्नत वहीं थी
हाय ये बदनसीबी, नाम जिसका गरीबी
छोड़ कर गाँव को, उस घनी छाँव को
शहर के हो गये, भीड़ में खो गये
एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव…

ये तो परदेश ठहरा, देश फिर देश ठहरा
हादसों की ये बस्ती, कोई मेला न मस्ती
क्या यहाँ ज़िंदगी है, हर कोई अजनबी है
छोड़ कर गाँव को, उस घनी छाँव को
शहर के हो गये, भीड़ में खो गये
एक प्यारा-सा गाँव, जिसमें पीपल की छाँव…


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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