सागर के किनारे!

हिन्दी साहित्य की महान विभूति स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| अज्ञेय जी तारसप्तक और तीन सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों का साहित्य हमारे सामने लाने का माध्यम बने थे|

अज्ञेय जी का उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ एक महान रचना है और भी अनेक उपन्यास और कहानियाँ हिन्दी साहित्य को उनका अमूल्य योगदान है और हिन्दी कविता में तो वे धारा परिवर्तन के एक महत्वपूर्ण कारक थे|

लीजिए आज प्रस्तुत है अज्ञेय जी की यह कविता जिसमें उन्होंने संध्या समय समुद्र किनारे मन में आए भावों को अभिव्यक्ति दी है–

सागर के किनारे
तनिक ठहरूँ, चाँद उग आये, तभी जाऊँगा वहाँ नीचे
कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे। चाँद उग आये।
न उसकी बुझी फीकी चाँदनी में दिखें शायद,

वे दहकते लाल गुच्छ बुरूँस के जो
तुम हो। न शायद चेत हो, मैं नहीं हूँ वह डगर गीली दूब से मेदुर,
मोड़ पर जिसके नदी का कूल है, जल है,
मोड़ के भीतर-घिरे हों बाँह में ज्यों-गुच्छ लाल बुरूँस के उत्फुल्ल।


न आये याद, मैं हूँ किसी बीते साल के सीले कलेंडर की
एक बस तारीख, जो हर साल आती है।
एक बस तारीख-अंकों में लिखी ही जो न जावे
जिसे केवल चन्द्रमा का चिह्न ही बस करे सूचित-

बंक-आधा-शून्य; उलटा बंक-काला वृत्त,
यथा पूनो-तीज-तेरस-सप्तमी,
निर्जला एकादशी-या अमावस्या।
अँधेरे में ज्वार ललकेगा-


व्यथा जागेगी। न जाने दीख क्या जाए जिसे आलोक फीका
सोख लेता है। तनिक ठहरूँ। कसमसाते रुद्ध सागर के किनारे
तभी जाऊँ वहाँ नीचे-चाँद उग आये।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********

2 Comments

Leave a Reply