इतने बरसों बाद!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि और गीतकार श्री अनूप अशेष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| लंबे समय तक बरसात को तरसने के बाद जब गाँव देहात में बारिश होती है तो सबके मन को सरसा जाती है, कृषक परिवारों के मन में एक नया उल्लास आ जाता है| यह गीत इसी स्थिति का है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, श्री अनूप अशेष जी का यह गीत –

इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।

गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।

अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।

अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।


लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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