आकुल अंतर!


आज फिर से सुरीले गीतों के सृजक और कवि कुल के गौरव सीनियर बच्चन जी, अर्थात स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| कवि जब व्याकुलता का अनुभव करता है तो वह सभी को किसी न किसी रूप में अपनी व्याकुलता में शामिल कर लेता है|

लीजिए आज प्रस्तुत है, स्वर्गीय हरिवंशराय बच्चन जी का यह गीत –

लहर सागर का नहीं श्रृंगार,
उसकी विकलता है;
अनिल अम्बर का नहीं, खिलवार
उसकी विकलता है;
विविध रूपों में हुआ साकार,
रंगो में सुरंजित,
मृत्तिका का यह नहीं संसार,
उसकी विकलता है।


गन्ध कलिका का नहीं उद्गार,
उसकी विकलता है;
फूल मधुवन का नहीं गलहार,
उसकी विकलता है;
कोकिला का कौन-सा व्यवहार,
ऋतुपति को न भाया?
कूक कोयल की नहीं मनुहार,
उसकी विकलता है।

गान गायक का नहीं व्यापार,
उसकी विकलता है;
राग वीणा की नहीं झंकार,
उसकी विकलता है;
भावनाओं का मधुर आधार
सांसो से विनिर्मित,
गीत कवि-उर का नहीं उपहार,
उसकी विकलता है।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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