बूढ़ा चांद!


आज फिर से मैं छायावाद युग के एक स्तंभ कवि स्वर्गीय सुमित्रा नंदन पंत जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता को भी उस युग की कविता का एक जीवंत दस्तावेज माना जा सकता है| हर युग में कविता ने एक नया स्वरूप धारण किया है|

लीजिए आज प्रस्तुत है सुमित्रा नंदन पंत जी की यह कविता –

बूढा चांद
कला की गोरी बाहों में
क्षण भर सोया है|

यह अमृत कला है
शोभा असि,
वह बूढा प्रहरी
प्रेम की ढाल!

हाथी दांत की
स्‍वप्‍नों की मीनार
सुलभ नहीं,-
न सही!
ओ बाहरी
खोखली समते,
नाग दंतों
विष दंतों की खेती
मत उगा!

राख की ढेरी से ढंका
अंगार सा
बूढा चांद
कला के विछोह में
म्‍लान था,
नये अधरों का अमृत पीकर
अमर हो गया!

पतझर की ठूंठी टहनी में
कुहासों के नीड़ में
कला की कृश बांहों में झूलता
पुराना चांद ही
नूतन आशा
समग्र प्रकाश है!


वही कला,
राका शशि,-
वही बूढा चांद,
छाया शशि है!

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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