सबकी वही नहीं है दुनिया!

चार घरों के एक मुहल्ले
के बाहर भी है आबादी,
जैसी तुम्हें दिखाई दी है
सबकी वही नहीं है दुनिया|

निदा फ़ाज़ली

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