और कुछ ख़िज़ाँ में खो गए!

लेके अपनी-अपनी किस्मत आए थे गुलशन में गुल,
कुछ बहारों मे खिले और कुछ ख़िज़ाँ में खो गए|

राजेश रेड्डी

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