माँ

आज श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी ने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना अमूल्य योगदान दिया है|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता, जिसमें उन्होंने ‘माँ’ को एक अनूठे अंदाज़ में याद किया है –

चेहरे पर
कुछ सख्त अँगुलियों के दर्द-भरे निशान हैं
और कुछ अँगुलियाँ
उन्हें दर्द से सहलाती हैं।

कुछ आँखें
आँखों में उड़ेल जाती हैं रात के परनाले
और कुछ आँखें
उन्हें सुबह के जल में नहलाती हैं।

ये दर्द-भरी अँगुलियाँ
ये सुबह-भरी आँखें
जहाँ कहीं भी हैं
मेरी माँ हैं।

माँ, जब तक तुम हो
मैं मरूँगा नहीं।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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