वह हवा पहाड़ी!

आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी तरह के अनूठे गीतकार आदरणीय बुदधिनाथ मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और यह भी दोहराना मुझे अच्छा लगता है कि मैं और डॉक्टर मिश्र जी ने किसी समय एक ही संस्थान हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड में कार्यरत रहे थे, वे कलकत्ता स्थित मुख्यालय में पदस्थापित थे और मैं एक परियोजना में| बाद में एक बार मुझे दार्जिलिंग में उनके संचालन में काव्यपाठ का अवसर भी मिला था|

लीजिए प्रस्तुत है बुदधिनाथ मिश्र जी का यह गीत जो पहाड़ी हवा के संबंध में कुछ सुंदर बातें हमारे सम्मुख रखता है –

वह हवा पहाड़ी
नागिन-सी जिस ओर गई
फिर दर्द भरे सागर में
मन को बोर गई ।

चादर कोहरे की ओढ़े
यायावर सोते
लहरों पर बहते फूल
कहीं अपने होते?

देहरी-देहरी पर
धर दूधिया अंजोर गई
चुपके-से चीड़ों के कन्धे झकझोर गई ।

कच्चे पहाड़-से ढहते
रिश्तों के माने
भरमाते पगडण्डी के
ये ताने-बाने ।


क़समों के हर नाज़ुक
रेशे को तोड़ गई
झुरमुट में कस्तूरी यादों की छोड़ गई ।

सीढ़ी-सीढ़ी उतरी
खेतों में किन्नरियाँ
द्रौपदी निहारे बैठ
अशरफ़ी की लड़ियाँ ।

हल्दी हाथों को
भरे दृगों से जोड़ गई
मौसम के सारे पीले पात बटोर गई ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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