आधी रात नींद खुल जाए!


पहली बार आज मैं श्री रमेश गौड़ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूं| मुझे याद नहीं है कि कभी मुझे उनका कविता पाठ सुनने का अवसर मिला हो, लेकिन वे अक्सर दिल्ली के कनॉट प्लेस में, कॉफी हाउस में उपस्थित रहते थे, बड़े प्रेम से मिलते थे और किसी कवि सम्मेलन में भी अत्यंत जागरूक श्रोता के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे| एक और बात कि वे शराब काफी पीते थे| वे अकविता आंदोलन से भी सक्रिय रूप से जुड़े थे|

लीजिए प्रस्तुत है श्री रमेश गौड़ जी का यह गीत –

जैसे सूखा ताल बचा रहे या कुछ कंकड़ या कुछ काई
जैसे धूल भरे मेले में चलने लगे साथ तन्हाई,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे सिफ़रों की क़तार बाक़ी हर जाए बिन इकाई ।

जैसे ध्रुवतारा बेबस हो, स्याही सागर में घुल जाए
जैसे बरसों बाद मिली चिट्ठी भी बिना पढ़े धुल जाए,
तेरे बिन मेरे होने का मतलब कुछ-कुछ ऐसा ही है
जैसे लावारिस बच्चे की आधी रात नींद खुल जाए ।

जैसे निर्णय कर लेने पर मन में एक द्विधा रह जाए
जैसे बचपन की क़िताब में कोई फूल मुँदा रह जाए,
मेरे मन पर तेरी यादें अब भी कुछ ऐसे अँकित हैं
जैसे खँडहर पर शासक का शासन-काल खुदा रह जाए ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 Comments

  1. I have not read much work of Ramesh Gaur but I hold him in high esteem for whatever little I have read him. The depth of his expression is eminently inferred from the last line of the first stanza – “ like a queue of zeros without the unit being in place “. Thanks sir for bringing this to the notice of your readers

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