ख़ुशबू कदम्ब के फूलों की!


डॉक्टर कुमार शिव, हिन्दी के बहुत श्रेष्ठ गीतकार थे, आकाशवाणी जयपुर में रहते हुए उनके साथ आकाशवाणी की कवि गोष्ठी तथा रिकॉर्डिंग में शामिल होने के भी अवसर प्राप्त हुए थे| उनकी एक पंक्ति जो पहले भी मैंने उद्धृत की थी, वह है – ‘फ्यूज बल्बों के अद्भुद समारोह में, रोशनी को शहर से निकाला गया|’
लीजिए प्रस्तुत है डॉक्टर कुमार शिव जी का यह नवगीत–

ख़ुशबू बिखरी है कदम्ब के फूलों की
कभी गुज़ारी थी हमने यह सुबह
तुम्हारे साथ ।

यही समय था जब हमने सीखा था
चुप्पी का उच्चारण
इक दूजे की आँखों में रहना
कर लेना आँसू का भण्डारण

स्मृतियाॅ उभरी होंठों की भूलों की
कभी गुज़ारी थी हमने यह सुबह
तुम्हारे साथ ।

जल भीगा एकान्त, उर्मियों का
मधुरम सम्वाद हठी चट्टानों से
दृष्टि नहीं हटती थी नदिया के
मुखड़े पर नीले पड़े निशानों से


चुभन पाँव में अब तक हरे बबूलों की
कभी गुज़ारी थी हमने यह सुबह
तुम्हारे साथ ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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