अब चाके-दिले-इन्सानियत को!

जब नाखूने-वहशत चलते थे, रोके से किसी के रुक न सके,
अब चाके-दिले-इन्सानियत को सीते हैं तो सीना मुश्किल है|

अर्श मलसियानी

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