कुछ सुनूँ मैं तेरी ज़बानी भी!

ख़ल्क़* क्या-क्या मुझे नहीं कहती
कुछ सुनूँ मैं तेरी ज़बानी भी।
*दुनिया

फ़िराक़ गोरखपुरी

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