तोड़ो !

आज स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रघुवीर सहाय जी ने अज्ञेय जी के बाद प्रतिष्ठित साप्ताहिक समाचार पत्रिका ‘दिनमान’ के संपादन का गुरुतर दायित्व संभाला था और लंबे समय तक उस पत्रिका का श्रेष्ठ संपादन किया था|
श्री रघुवीर सहाय जी उन कवियों में से एक थे जो कविता में अधिक शब्द न भरते हुए गहरी बात कहने का प्रयास करते थे|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रघुवीर सहाय जी की यह कविता –

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये पत्‍थर ये चट्टानें
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती का हम जानें
सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है
अपने मन के मैदानों पर व्‍यापी कैसी ऊब है
आधे आधे गाने

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये ऊसर बंजर तोड़ो
ये चरती परती तोड़ो
सब खेत बनाकर छोड़ो
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्‍या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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