आदमी का आकाश!

लीजिए आज एक बार फिर से स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रामावतार त्यागी जी की कविताओं में खुद्दारी और आत्मविश्वास विशेष रूप से झलकते थे| उनकी एक पंक्ति जिसे अक्सर उद्धृत किया जाता है, वह है- ‘हमें हस्ताक्षर करना न आया चेक पर माना, मगर दिल पर बड़ी कारीगरी से नाम लिखते हैं’|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामावतार त्यागी जी की यह कविता –

भूमि के विस्तार में बेशक कमी आई नहीं है
आदमी का आजकल आकाश छोटा हो गया है ।

हो गए सम्बन्ध सीमित डाक से आए ख़तों तक
और सीमाएँ सिकुड़कर आ गईं घर की छतों तक
प्यार करने का तरीका तो वही युग–युग पुराना
आज लेकिन व्यक्ति का विश्वास छोटा हो गया है ।

आदमी की शोर से आवाज़ नापी जा रही है
घण्टियों से वक़्त की परवाज़ नापी जा रही है
देश के भूगोल में कोई बदल आया नहीं है
हाँ, हृदय का आजकल इतिहास छोटा हो गया है ।

यह मुझे समझा दिया है उस महाजन की बही ने
साल में होते नहीं हैं आजकल बारह महीने
और ऋतुओं के समय में बाल भर अन्तर न आया
पर न जाने किस तरह मधुमास छोटा हो गया है ।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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