सिमटे तो दिल-ए-आशिक़!

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है,
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है|

जिगर मुरादाबादी

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