ठेकेदार भाग लिया!

प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता आज शेयर कर रहा हूँ| मेरा खयाल है कि अशोक चक्रधर जी से तो आप सभी परिचित होंगे| इस कविता में भी एक प्रकार की हड़ताल ही है जिसे मनुष्य नहीं भवन निर्माण जैसे कार्यों में प्रयुक्त होने वाले यंत्र और सामग्री कर रहे हैं, एक और बात यह कि अशोक जी शायद इन यंत्रों से अधिक परिचित हैं, क्योंकि एक-दो यंत्रों को तो मैं नहीं पहचान पाया|

लीजिए प्रस्तुत है अशोक चक्रधर जी की यह व्यंग्य कविता–



फावड़े ने
मिट्टी काटने से इंकार कर दिया
और
बदरपुर पर जा बैठा
एक ओर

ऐसे में
तसले को मिट्टी ढोना
कैसे गवारा होता ?
काम छोड़ आ गया
फावड़े की बगल में।
धुरमुट की क़दमताल…..रुक गई,
कुदाल के इशारे पर
तत्काल,

झाल ज्यों ही कुढ़ती हुई
रोती बड़बड़ाती हुई
आ गिरी औंधे मुंह
रोड़ी के ऊपर।


-आख़िर ये कब तक ?
-कब तक सहेंगे हम ?
गुस्से में ऐंठी हुई
काम छोड़ बैठ गईं
गुनिया और वसूली भी
ईंटों से पीठ टेक,
सिमट आया नापासूत
कन्नी के बराबर।

-आख़िर ये कब तक ?

-कब तक सहेंगे हम ?
गारे में गिरी हुई बाल्टी तो
वहीं-की-वहीं
खड़ी रह गई
ठगी-सी।


सब्बल
जो बालू में धंसी हुई खड़ी थी
कई बार
ज़ालिम ठेकेदार से लड़ी थी।

-आख़िर ये कब तक ?

-कब तक सहेंगे हम ?

-मामला ये अकेले
झाल का नहीं है
धुरमुट चाचा !
कुदाल का भी है
कन्नी का, वसूली का,
गुनिया का, सब्बल का
और नापासूत का भी है,
क्यों धुरमुट चाचा ?
फावड़े ने ज़रा जोश में कहा।


और ठेक पड़ी हथेलियां
कसने लगीं-कसने लगीं
कसती गईं-कसती गईं।

एक साथ उठी आसमान में
आसमान गूंज गया कांप उठा डरकर।

ठेकेदार भाग लिया टेलीफ़ोन करने।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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