प्रक्रिया

आज श्री भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| मैं यायावर जी से कभी मिला तो नहीं हूँ परंतु वे मेरे फ़ेसबुक मित्र थे, अक्सर वे अपने मूल्यवान आलेख, कविताएं और संस्मरण शेयर करते रहते थे| उनके साथ कई बार फ़ेसबुक पर कुछ चर्चाओं में भाग लिया काफी अच्छा लगता था| रेणु जी पर और कुछ अन्य साहित्यकारों के संबंध में उन्होंने बहुत उपयोगी शोध तथा लेखन कार्य किया और ऐसे और भी कार्य कर रहे थे| इसी बीच उनके स्वर्गवास की दुखद खबर मिली|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय श्री भारत यायावर जी की यह कविता–

मैं तुम्हारे पास बैठा हूँ
मैं तुम्हारे पास नहीं बैठा हूँ

मैं भटक रहा हूँ जंगल में
जंगल में गुर्रा रहे हैं चीते
चीतों की आँखें लाल हैं
चीतों के पंजे पैने हैं
मैं डर रहा हूँ
मैं बहुत डर रहा हूँ

मैं तुम्हारे पास बैठा हूँ
पर मेरे अन्दर मंडरा रही है एक चील
चील दहशत का नाम है
उसकी चोंच में माँस का एक लोथड़ा है
वह मेरा हृदय है
वह धड़क रहा है
वह तेज़ी से धड़क रहा है


यह मैं कहाँ पहुँच रहा हूँ
कितनी गहराइयों में उतर रहा हूँ


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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