निराला के प्रति

स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी को कवियों का कवि कहा जाता था, अर्थात उनकी कविताओं का अध्ययन करते हुए नए कवि काव्य लेखन सीख सकते हैं, ऐसे भी कह सकते हैं कि जिनकी कविताओं को सामान्य श्रोताओं की अपेक्षा कवियों से, काव्य मर्मज्ञों से अधिक सराहना प्राप्त होती है|

श्री सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हिन्दी के एक अनूठे कवि थे, वे हिन्दी कविता की पहचान बन गए थे और हिन्दी कविता में उनके जैसा विराट व्यक्तित्व शायद कोई और नहीं है|

आज जो कविता मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह स्वर्गीय शमशेर बहादुर सिंह जी ने निराला जी की स्मृति में लिखी थी, लीजिए प्रस्तुत है यह कविता–

भूलकर जब राह- जब-जब राह…भटका मैं
तुम्हीं झलके, हे महाकवि,
सघन तम की आंख बन मेरे लिए,
अकल क्रोधित प्रकृति का विश्वास बन मेरे लिये-
जगत के उन्माद का
परिचय लिए,-
और आगत-प्राण का संचय लिए, झलके प्रमन तुम,
हे महाकवि! सहजतम लघु एक जीवन में
अखिल का परिणय लिए-
प्राणमय संचार करते शक्ति औ’ छवि के मिलन का हास मंगलमय;
मधुर आठों याम
विसुध खुलते
कंठस्वर में तुम्हारे, कवि,
एक ऋतुओं के विहंसते सूर्य!
काल में (तम घोर)-
बरसाते प्रवाहित रस अथोर अथाह!
छू, किया करते
आधुनिकतम दाह मानव का
साधना स्वर से
शांत-शीतलतम ।

हाँ, तुम्हीं हो, एक मेरे कवि :
जानता क्या मैं-
हृदय में भरकर तुम्हारी साँस-
किस तरह गाता,
(ओ विभूति परंपरा की!)
समझ भी पाता तुम्हें यदि मैं कि जितना चाहता हूँ,
महाकवि मेरे !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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