गुजरे बरसों बरस!

श्री राम कुमार कृषक जी हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि हैं| मुझे स्मरण है कि मैंने दिल्ली में बहुत समय पहले, उनके साथ कुछ कवि गोष्ठियों में भाग लिया था, उनके साथ उनके मित्र श्री पुरुषोत्तम प्रतीक भी गोष्ठियों में आते थे| कृषक जी का एक गीत उस समय बहुत प्रसिद्ध था- ‘बागड़ की छोकरियाँ’ जिसको मैंने पहले शेयर किया है, अभी उसकी प्रारंभिक पंक्तियाँ दोहरा रहा हूँ-

नंगे पाँवों, हाथ कुदाली, सिर बजरी की टोकरियाँ
नंगापन शहरों का ढकतीं, ये बागड़ की छोकरियाँ|


लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राम कुमार कृषक जी का यह नवगीत –

कपड़ा-लत्ता जूता-शूता
जी-भर पास नहीं
भीतर आम नहीं हो पाता
बाहर ख़ास नहीं

जिए ज़माने भर की ख़ातिर
घर को भूल गए
उर-पुर की सीता पर रीझे
खीजे झूल गए
राजतिलक ठुकराया
भाया पर वनवास नहीं

भाड़ फोड़ने निकले इकले
हुए पजलने को
मिले कमेरे हाथ/ मिले पर
खाली मलने को
धँसने को धरती है
उड़ने को आकाश नहीं

औरों को दुख दिया नहीं
सुख पाते भी कैसे
कल परसों क्या यों जाएंगे
आए थे जैसे
गुज़रे बरसों-बरस
गुज़रते बारह मास नहीं !


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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